एक शिवभक्त ऐसी भी चप्पलें उठाने वाले हाथों में दिखा इंसानियत का सबसे बड़ा धर्म,शिवभक्तों की राह साफ करने सड़क पर उतरीं क्रांतिकारी शालू सैनी
(इमरान देशभक्त)
रुड़की।लावारिस शवों को अंतिम यात्रा से मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाली शालू सैनी ने कांवड़ मार्ग पर भी सेवा की मिसाल पेश कर भोले के भक्तों की बिखरी चप्पलें खुद उठाकर राह बनाई।उन्होंने कहा कि सेवा में न कोई बड़ा होता है,न छोटा,हर शिवभक्त में मुझे भोलेनाथ दिखाई देते हैं।सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और आस्था का पर्व है।मुजफ्फरनगर की धरती पर जब हर-हर महादेव के जयघोष के बीच लाखों शिवभक्त पवित्र गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं,तो जगह-जगह सेवा के अनेक रंग दिखाई देते हैं।कोई भोजन कराता है,कोई चिकित्सा सेवा देता है,कोई विश्राम की व्यवस्था करता है तो कोई कांवड़ियों के पैरों की थकान दूर करने में जुटा नजर आता है,लेकिन इसी सेवाभाव के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई,जिसने इंसानियत और निस्वार्थ सेवा की परिभाषा को और भी गहरा कर दिया।लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर उन्हें मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाली क्रांतिकारी शालू सैनी शिवभक्तों की सेवा में कुछ ऐसा करती दिखाई दीं,जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।सड़क पर शिवभक्तों की आवाजाही के बीच जब चप्पलें और सैंडल इधर-उधर बिखर गईं,तो उन्होंने किसी कर्मचारी या किसी अन्य व्यक्ति का इंतजार नहीं किया।खुद आगे बढ़ीं और एक-एक चप्पल उठाकर सड़क के किनारे व्यवस्थित करने लगीं,ताकि हरिद्वार की पवित्र धरती से गंगाजल लेकर लौट रहे भोले के भक्तों को आवागमन में किसी प्रकार की परेशानी न हो।उनकी यह तस्वीर केवल चप्पल उठाने की तस्वीर नहीं,बल्कि निस्वार्थ सेवा,विनम्रता और इंसानियत के उस भाव की तस्वीर है,जिसमें सेवा करने वाला व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा और पहचान को पीछे छोड़ देता है।क्रांतिकारी शालू सैनी का कहना है कि उनके लिए सेवा किसी दिखावे का माध्यम नहीं,बल्कि जीवन का उद्देश्य है।उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति भगवान शिव की भक्ति में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर गंगाजल लेकर चलता है,उसके पैरों में थकान होती है और उसके सामने रास्ते की छोटी-सी परेशानी भी बड़ी बन सकती है,तो ऐसे समय में उसकी मदद करना ही सबसे बड़ी सेवा है। उन्होंने कहा कि मैंने सड़क पर बिखरी चप्पलें इसलिए उठाईं क्योंकि मेरी नजर में यह चप्पलें नहीं थीं,बल्कि भोले के भक्तों की राह में आई हुई बाधाएं थीं।अगर मेरे हाथों से कुछ चप्पलें एक तरफ हो जाती हैं और किसी शिवभक्त को चलने में आसानी हो जाती है,तो इससे बड़ी खुशी मेरे लिए कुछ नहीं हो सकती।
*लावारिस शवों से लेकर शिवभक्तों तक,सेवा ही बना जीवन का संकल्प*
क्रांतिकारी शालू सैनी का सेवा कार्य केवल कांवड़ यात्रा तक सीमित नहीं है।वह उन लोगों के अंतिम संस्कार का जिम्मा भी उठाती हैं, जिनके अपने दुनिया में नहीं होते या जिनके शव लावारिस अवस्था में मिलते हैं।ऐसे शवों को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दिलाने के लिए वह आगे आती हैं और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाती हैं।शालू सैनी बताती हैं कि किसी लावारिस व्यक्ति की अंतिम यात्रा में उसके साथ खड़ा होना उनके लिए सबसे बड़ी मानव सेवा है।उनका मानना है कि जिस व्यक्ति को जीवन में शायद कोई अपना कंधा नसीब नहीं हुआ,उसे मृत्यु के बाद सम्मानजनक अंतिम विदाई जरूर मिलनी चाहिए।उनके अनुसार, अंतिम संस्कार उनके लिए केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं,बल्कि उस इंसान के प्रति आखिरी सम्मान है। वह कहती हैं कि जिसका इस दुनिया में कोई नहीं होता,उसके लिए अगर मैं बेटी बनकर खड़ी हो जाऊं, तो मुझे लगता है कि मेरा जीवन सार्थक हो गया।
*अंतिम संस्कार ही नहीं, श्राद्ध तक निभाती हैं जिम्मेदारी*
क्रांतिकारी शालू सैनी की सेवा भावना का एक और पक्ष लोगों को भावुक कर देता है। जिन लावारिस शवों का वह अंतिम संस्कार करती हैं,उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को अंतिम संस्कार के साथ खत्म नहीं मानतीं।वह अपने द्वारा किए गए अंतिम संस्कारों का श्राद्ध भी मनाती हैं,ताकि जिन लोगों के परिवार या अपने इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं, उनकी आत्मा के लिए भी धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्रद्धा और सम्मान का भाव बना रहे।शालू सैनी का कहना है कि अंतिम संस्कार के बाद मेरी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।जिस व्यक्ति को मैंने अपना मानकर अंतिम विदाई दी, उसकी आत्मा के प्रति श्रद्धा रखना भी मेरे लिए उतना ही जरूरी है।मैं मानती हूं कि इंसान की पहचान उसके रिश्तों से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है।उनका यह भाव उनके सेवा कार्य को एक अलग पहचान देता है।जहां आमतौर पर लोग अंतिम संस्कार को ही अंतिम पड़ाव मानते हैं, वहीं शालू सैनी मृतकों के प्रति अपनी श्रद्धा और जिम्मेदारी को आगे भी निभाने का प्रयास करती हैं।
*मुजफ्फरनगर में शिवभक्तों की सेवा बनी तपस्या*
सावन माह में हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर आने वाले कांवड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती है।दूर-दूर से शिवभक्त पवित्र गंगाजल लेने हर की पैड़ी और गंगा घाटों पर पहुंचते हैं,इसके बाद कठिन पैदल यात्रा शुरू होती है।ऐसे में रास्ते में सेवा शिविरों का महत्व भी बढ़ जाता है।क्रांतिकारी शालू सैनी ने भी इस दौरान तन,मन और धन से शिवभक्तों की सेवा करने का संकल्प लिया।उनके लिए सेवा का मतलब केवल भोजन या पानी उपलब्ध कराना नहीं था,बल्कि जहां जो आवश्यकता दिखाई दी, वहीं हाथ बढ़ा देना था।इसी सेवा के दौरान जब उन्हें सड़क पर बड़ी संख्या में चप्पलें और सैंडल बिखरे हुए दिखाई दिए,तो उन्होंने खुद उन्हें उठाना शुरू कर दिया।तस्वीर में वह सड़क के किनारे झुककर चप्पलों को एक तरफ व्यवस्थित करती दिखाई दे रही हैं।आसपास शिवभक्तों की आवाजाही जारी है, वाहन गुजर रहे हैं और कांवड़ यात्रा का माहौल बना हुआ है,लेकिन शालू सैनी का ध्यान केवल एक बात पर था रास्ता साफ रहे और शिवभक्तों को परेशानी न हो।
भोले के भक्तों की चप्पल उठाना भी मेरे लिए पूजा है*
क्रांतिकारी शालू सैनी ने कहा कि मैं भगवान शिव की पूजा केवल मंदिर में जाकर नहीं करती।मेरे लिए शिवभक्तों की सेवा भी भोलेनाथ की पूजा है। जब कोई भक्त इतनी दूर से गंगाजल लेकर पैदल चल रहा है और उसकी सेवा करने का अवसर मुझे मिलता है, तो मैं इसे अपना सौभाग्य मानती हूं।
उन्होंने कहा कि किसी की चप्पल उठाने में मुझे कोई छोटापन महसूस नहीं होता,बल्कि मुझे गर्व होता है कि मेरे हाथ किसी शिवभक्त की राह को आसान बनाने के काम आ रहे हैं। सेवा में अहंकार नहीं होना चाहिए।अगर सेवा करते समय भी हम यह सोचें कि कौन बड़ा है और कौन छोटा,तो फिर वह सेवा नहीं रह जाती।उनका कहना है कि सावन में शिवभक्तों की सेवा करना उनके लिए केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि आस्था और मानवता का संगम है।
*सेवा के सामने पहचान और प्रतिष्ठा सब छोटी*
क्रांतिकारी शालू सैनी की तस्वीर सामने आने के बाद उनके सेवा भाव की चर्चा होने लगी,जिस कार्य को कोई छोटा काम समझ सकता है,उसे उन्होंने बड़े प्रेम और समर्पण के साथ किया। उनके हाथों में न कोई दिखावा था,न चेहरे पर किसी सम्मान की अपेक्षा बस शिवभक्तों की राह आसान करने की भावना थी।शालू सैनी कहती हैं कि मुझे सम्मान की जरूरत नहीं है। मुझे तो सिर्फ यह संतोष चाहिए कि मेरे कारण किसी इंसान को थोड़ी राहत मिली, किसी जरूरतमंद को अंतिम सम्मान मिला या किसी शिवभक्त की राह थोड़ी आसान हुई। उनके अनुसार, समाज में सबसे जरूरी चीज मानवता है।धर्म,जाति,वर्ग और पहचान से ऊपर उठकर किसी जरूरतमंद के काम आना ही वास्तविक धर्म है।
*एक तरफ लावारिस शवों को कंधा, दूसरी तरफ शिवभक्तों की चप्पलें उठाने वाले हाथ*
क्रांतिकारी शालू सैनी के सेवा कार्य की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि उनके लिए सेवा का कोई निश्चित दायरा नहीं है। जहां जरूरत दिखाई देती है, वहीं वह खड़ी नजर आती हैं।किसी लावारिस शव को सम्मानजनक अंतिम विदाई दिलाने से लेकर उसके श्राद्ध तक की जिम्मेदारी निभाना और दूसरी ओर सावन में शिवभक्तों की राह से चप्पलें हटाकर रास्ता साफ करना इन दोनों कार्यों के पीछे एक ही भावना दिखाई देती है।क्रांतिकारी शालू सैनी कहती हैं कि जिसे समाज ने छोड़ दिया,उसे अपनाना और जो भगवान की भक्ति में निकला है, उसकी राह आसान करना मेरे लिए दोनों ही सेवा हैं। मैं अपने जीवन में जितना कर सकती हूं,उतना करती रहूंगी।मुजफ्फरनगर की सड़कों पर सामने आई यह तस्वीर इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें सेवा का कोई मंच नहीं, कोई बड़ा आयोजन नहीं और कोई औपचारिक सम्मान नहीं दिखाई देता। यहां सिर्फ एक महिला है,जो सड़क पर झुककर शिवभक्तों की बिखरी चप्पलें उठा रही है और उनके रास्ते को सुगम बनाने में जुटी है।यही वह क्षण है, जहां सेवा शब्दों से निकलकर कर्म बन जाती है और शायद इसी कर्म में क्रांतिकारी शालू सैनी की वह सोच दिखाई देती है,जिसके अनुसार जिसके काम आ सको, उसके काम आ जाओ,क्योंकि इंसान के लिए इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।
